वडोदरा (गुजरात) [भारत], 1 अक्टूबर: पारूल विश्वविद्यालय में अपने अनुठे कानून सम्बन्धित कॉन्क्लेव संविधान पे चर्चा के चौथे संस्करण का आयोजन किया गया| इस समारोह में न्यायपालिका क्षेत्र के ख्यातनाम दिग्गज, वरिष्ठ अधिवक्ता गण, कानून के व्यवसायी और विधि के छात्रों ने सहभाग लिया| इस समारोह में संवैधानिक मूल्य, वर्तमान के कानून से जुड़े मुद्दे और कानून के बदलते परिप्रेक्ष्य के बारे में चर्चा की गई| इस कॉन्क्लेव में विशेषज्ञों का मार्गदर्शन, चर्चा सत्र, पीयु संवाद, कार्यशालाएँ और प्रतियोगिता मंच थे और इनके द्वारा छात्रों को अपनी क्लासरूम के बाहर जाकर कानून क्षेत्र की हस्तियों के साथ संवाद करने का मौका मिला|
इन विशिष्ट दिग्गजों में भारतीय उच्चतम न्यायालय के आदरणीय न्यायमूर्ति श्री. विपूल एम. पंचोली, गुजरात उच्च न्यायालय के आदरणीय न्यायमूर्ति श्री. डी. एन. रे, गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आदरणीय श्री. एन. एस. संजय गोडा, भारतीय उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता तथा भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. गौरव भाटिया, भारतीय उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री. महालक्ष्मी पावनी और भारतीय उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री. अनिता शेणॉय समेत कानून के क्षेत्र से जुड़े कई विख्यात व्यक्ति सम्मीलित हुए| इनकी उपस्थिति से उभरते अधिवक्ताओं को न्यायपालिका क्षेत्र के दिग्गजों को प्रत्यक्षसुनने का मौका मिला तथा कानून शिक्षा और एडवोकसी से जुड़े वास्तविक पहलू समझने का मौका मिला|

कानून के व्यवसाय को ले कर संवैधानिक तत्त्वों का महत्त्व अधोरेखित करते हुए तथा भविष्य के अधिवक्ताओं के बारे में बात करए हुए आदरणीय न्यायमूर्ति श्री. विपूल मनुभाई पंचोली ने कहा, ” कानून सीखानेवाले विश्वविद्यालय को सिर्फ कानून की शिक्षा देने का ही दायित्व नही होता है, बल्की व्यवसायिक नीतिमत्ता, संवैधानिक मूल्य और सामाजिक जिम्मेदारी को भी बढ़ावा देने का दायित्व होता है| इसलिए भविष्य के अधिवक्ताओं को सिर्फ कानून का ज्ञान होना पर्याप्त नही है, बल्की उन्हे जिस समाज और टेक्नोलॉजी के बीच कानून काम करता है, उन्हे भी समझना पड़ेगा| भविष्य के अधिवक्ता के रूप में स्मरण रखिए कि एडवोकसी सिर्फ जीतने के बारे में नही है, बल्की न्यायपूर्ण और कानून की दृष्टि से उचित निर्णय लेने में न्यायालय की सहायता करना भी है|”
श्रोताओं से संवाद करते हुए आदरणीय न्यायमूर्ति श्री. डी. एन. रे ने संवैधानिक और कानून से जुड़े मुद्दों पर अपने दृष्टिकोण रखे और तेज़ी से बदलनेवाली दुनिया में युवाओ के सामने होनेवाली चुनौतियो पर भी प्रकाश डाला| उन्होने कहा, “तत्काल समाधान मिलने के और इन्स्टंट सक्सेस के आजके युग में असफल होने की तैयारी कृपया कीजिए| यह सबसे अहम सीख है जो कभी कोई आपको नही सीखाता है| असफल होना ठीक है| कोई हर्ज नही है| इसलिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात असफल होना स्वीकार करना है और ऐसे सभी अनुभवों से सीखते जाना है| आपको समझना है कि आप किसी के साथ प्रतियोगिता नही कर रहे हैं| आपका एकलौता प्रतिस्पर्धी आप स्वयं हैं|”

इस परिचर्चा में भारतीय उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता तथा भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. गौरव भाटिया के द्वारा एक संवाद के स्वरूप में पीयु टॉक भी दिया गया जिसका विषय था “जीवित संविधान: जनसत्ता, कानून की सत्ता और मूलभूत अधिकारों का बदलता परिप्रेक्ष्य|” इस सत्र में संवैधानिकतत्त्व तथा वर्तमान भारत के मूलभूत अधिकारों के बदलते आंकलन पर चर्चा की गई| इस चर्चा को वर्तमान संवैधानिक पृष्ठभूमि के और समीप लाते हुए और बदलते समाज के सन्दर्भ में संवैधानिक तत्त्वों को समझने पर बल देते हुए उन्होने कहा, “संविधान समानता, स्वतन्त्रता, बन्धुता और न्याय के बारे में चर्चा करता है| अगर आपको सम्मान नही मिलता है, तो जीवन का क्या मकसद होगा? यह अस्तित्व से भी महत्त्वपूर्ण है| साँस लेना ही जीना नही होता है| जीवन का अर्थ जीने के साथ सम्मान के स्वरूप में आत्मा जुड़ना यह होता है|
भारतीय संविधान– अतीत में, आज और कल इस विषय पर छात्रों के साथ संवाद करते हुए गुजरात उच्च न्यायालय के आदरणीय न्यायमूर्ति एन. एस. संजय गोडा ने कहा “संविधान ऐसी पुस्तिका है जो हमें निर्माण करती है| संविधान की मूलभूत आवश्यकता हम क्या कर सकते हैं, यह हमें बताना नही है, बल्की हम क्या नही कर सकते हैं और हमें क्या नही करना चाहिए, यह बताना है|”

इस अवसर पर पारूल विश्ववियालय के अध्यक्ष डॉ. देवांशू पटेल ने कहा, “संविधान पे चर्चा यह ऐसा प्रयास है जो अर्थपूर्ण संवाद के साथ संविधान की विचारधारा को कानून के व्यवसायिकों की आनेवाली पीढ़ि के सामने लाता है| न्यायमूर्ति, अधिवक्ता गण और विशेषज्ञों के साथ मिल कर छात्रों को ऐसे दृष्टिकोण मिल सकते हैं जिससे उनके शैक्षिक अध्ययन को बढ़ावा मिलता है और कानून के व्यवसाय के तत्त्व, दायित्व और वास्तवता को ले कर और सक्रिय पहल करने की प्रेरणा उन्हे मिलती है|”
कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन करनेवाले पारूल विश्वविद्यालय के विधि के छात्रों का सम्मान भी इस कॉन्क्लेव में किया गया| हैद्राबाद के आईसीएफएआई लॉ स्कूल द्वारा आयोजित 11 वी श्री. एन. जे. यशस्वी मेमोरियल मूट कोर्ट कंपिटिशन 2026 के विजेता सचिदानंद पाटील, जय गलवानी और इशांत सुतार को सम्मानित किया गया| नई दिल्ली की इनोवेशन इन्स्टिट्युट ऑफ लॉ के द्वारा आयोजित नॅशनल मूट कोर्ट कंपिटीशन 2026 में सर्वश्रेष्ठ वक्ता बने प्रियोदर्शिनी रॉय को सम्मानित किया गया| गुजरात के जेजी विश्वविद्यालय में सबसे बड़ी परिचर्चा में कुंज प्रजापती का विशेष उल्लेख किया गया तथा एआईपीपीएम में कांस्य पदक जीतनेवाले स्वयं प्रकाश शुल्का का भी विशेष उल्लेख किया गया|
संविधान पे चर्चा 4.0 में प्रतियोगिता पहल के रूप में मूट कोर्ट कंपिटीशन का आयोजन किया गया तथा उसके क्वार्टर फायनल और सेमी फायनल राउंडस अंग्रेजी और गुजराती में हुए| इसमें छात्रों को कानून क्षेत्र के दिग्गजों के सामने अपना कानून से जुड़ा अनुसंधान, विवाद कौशल और एडवोकसी कौशल्य प्रस्तुत करने के लिए विशेष मंच प्रदान किया गया|

शैक्षिक कार्यक्रम में कार्यशालाएँ भी हुईं| श्री. निहित नागपाल के द्वारा “नवाचार वि. नियमन: डिजिटल अर्थव्यवस्था में संवैधानिक सन्तुलन की खोज” तथा श्री. जफर खुर्शीद के द्वारा “संविधान या अधिकार: आज के भारत में समानता, स्वतन्त्रता और प्रतिष्ठा“ प्रस्तुत की गई| अंग्रेजी और गुजराती में हुई इन प्रतियोगिताओं के द्वारा छात्रों को प्रतियोगिता के वातावरण में अपने कानून के तर्क और समर्थन कौशलों की जाँच करने का पुख़्ता अवसर मिला|
न्यायपालिका के वरिष्ठ सदस्य गण के द्वारा अभिभाषण के साथ तथा छात्रों के साथ प्रश्न- उत्तर के सत्र के द्वारा और विजेताओं को पुरस्कार के द्वारा सम्मानित करने के बाद यह तीन दिवसीय संगोष्ठि सम्पन्न हुई| पटना उच्च न्यायालय के आदरणीय न्यायमूर्ति श्री. सुरेन्द्र पाण्डेय ने संवैधानिक मूल्य, मानवीय प्रतिष्ठा और न्यायालयीन दायित्व पर अपने विचार रखें और छात्रों को जनहित याचिकाओं के बारे में सोचने के लिए और न्याय वितरण प्रणाली में योगदान देने के लिए कहा| उन्होने उन्हे याद दिया, “सिर्फ किसी का दृष्टिकोण अलग है, इसलिए किसी के साथ शत्रूता करनी आवश्यक नही है|” उन्होने कहा, “न्यायाधीश संविधान के मालिक नही होते हैं| उन्हे बस उसका विश्लेषण करने का दायित्व दिया गया है| संविधान तो हम सबका है|”
केरला उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सोमन सेन ने मूलभूत अधिकार, धारा 21, संवैधानिक नैतिकता, इमर्जन्सी, मूलभूत संरचना और नई टेक्नोलॉजीज के कारण होनेवाली चुनौतियों के बारे में अपने विचार रखे| उन्होने कहा, “आज हम इस सभागार से बाहर जाएंगे, लेकीन संविधान उसके भीतर नही आ सकता है|” कानून की एडवोकसी में सोच और तर्क के महत्त्व पर उन्होने बल दिया: “किसी के पक्ष का समर्थन उसके अनुपात पर नही, बल्की उसके पीछे होनेवाले विचार की गुणवत्ता पर निर्भर करता है|”
भारतीय उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति एन. कोटेश्वर सिंह ने युवा अधिवक्ताओं के करिअर की दिशा के बारे में बात करते हुए छात्रों और अभिभावकों को एआई, सायबर अपराध, न्याय विज्ञान (फॉरेन्सिक सायन्स) के बारे में आगाह किया और पैसा अपनी पहली प्राथमिकता न देने की सलाह दी| “जब आप शुरूआत करते हैं, तो पैसों के बारे में मत सोचिए|” उन्होने कहा, “सबसे बड़ी बात व्यक्तियों का सम्मान है| यह सबसे अहम है|” छात्रों के लिए उनका सूत्र था: “स्मार्ट अधिवक्ता बनिए|”
छात्रों ने न्यायपालिका में प्रादेशिक विविधता, सोशल मीडिया अल्गोरिदम्स, आपराधिक जाँच प्रक्रियाओं में विलम्ब, धार्मिक और नागरी विवाद, लम्बे समय तक कारागृह में डालना (incarceration), एनडीपीएस मामले और तेज़ी से जाँच की जाने के अधिकार समेत कई प्रश्न अन्तिम चर्चा में पूछे| तीसरी राज्य मूट कोर्ट प्रतियोगिता (गुजराती) के विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए गए जिसमें पुरस्कार राशि रू. 15,000 और रू. 60,000 थी| तथा चौथे आंतर- विश्वविद्यालयीन मूट कोर्ट कंपिटीशन 2026 के विजेताओं को भी सम्मानित किया गया और इसमें पुरस्कार राशि रू. 40,000 और रू. 1.75 लाख थी|
संविधान पे चर्चा 4.0 में न्याय क्षेत्र की प्रतिभा, व्यावसायिक दृष्टिकोण और छात्रों की एडवोकसी के बीच आदान प्रदान हुआ तथा विधी के छात्रों को संविधान, वर्तमान की कानूनी चुनौतियाँ और न्याय प्रणाली का वास्तव इनको ले कर संवाद करने के लिए मंच मिल सका| इस संवाद, प्रतियोगिता और इस क्षेत्र के दिग्गजों के साथ सीधे संवाद ने इस पहल को सफल बनाया|
